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संघ के एजेंडे में एक समान शिक्षा व्यवस्था

MPNEWSLIVE : 7 सितंबर , 2015

भोपाल ।। देश में एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू हो, अलग-अलग पाठ्यक्रम और शिक्षा के नाम पर चल रही 'दुकानें" बंद होना चाहिए। सीबीएसई तय करे कि पूरे देश में एक जैसा पाठ्यक्रम बने। एनसीईआरटी ही एकमात्र संस्था हो जो बच्चों के लिए किताबें छापे। देशभर में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य की जाए, गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी हिन्दी को पास-फेल के बंधन से मुक्त रखकर बच्चों को एक पीरीएड की पढ़ाई जरूर कराएं। आज प्रगति के मायने पाश्चात्य संस्कृति की नकल मान लिए गए हैं, जबकि सांस्कृतिक चेतना एवं भारतीयता ही देश की आत्मा है। शिक्षा आयोग के गठन की प्रक्रिया जल्दी पूरी की जाए। बीजेपी शासित राज्यों के शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रियों की दिल्ली बैठक में ये सुझाव रखे गए।

इस महत्वपूर्ण बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रय होसबोले, बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ विनय सहस्रबुद्धे, बीजेपी नेता एवं मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी सहित संघ के अनेक विचारक भी मौजूद थे। मप्र से चार मंत्रियों पारस जैन, उमाशंकर गुप्ता, दीपक जोशी एवं सुरेंद्र पटवा ने इसमें शिरकत की।
सत्ता, संगठन एवं आरएसएस के दिग्गज नेताओं के सुझावों पर सभी राज्यों के मंत्रियों ने भी सहमति जताई। इस मौके पर यह भी कहा गया कि कांग्रेस अब मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को ढोती रही है, इससे हमारी युवा पीढ़ी जड़ों से कट गई। इस दौरान संघ के एक विचारक ने सवाल उठाया कि भारत में भारतीयता होनी चाहिए कि नहीं? इस पर देश भर में बहस होनी चाहिए। भारतीयता तो देश की आत्मा है, शरीर में यदि दूसरी आत्मा प्रवेश कर जाए तो उसे भूतग्रस्त कहते हैं। 
उजाले की संताने अंधेरे की गोद में
संघ पदाधिकारी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति को ही प्रगति का पैमाना माना जा रहा है। बच्चों के जन्मदिन पर हमारी संस्कृति में दीये का उजाला कर खुशियां मनाने की परंपरा है, लेकिन आज मोमबत्ती बुझाकर हम तालियां बजाते हैं। उजाले की संतानें अंधेरों की गोद में हैं। अब समय आ गया है जब हम अपनी संस्कृति से इनका परिचय कराएं। आने वाली नस्लें भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक चेतना के लिए शिक्षा नींव का काम करेगी। किसी देश की कमर तोड़ने के लिए उसकी संस्कृति और शिक्षा व्यवस्था पर चोट करना काफी है।

 
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