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मैं सोचता हूं मुझे हिन्‍दी नहीं आती तो मेरा क्‍या होता: मोदी

MPNEWSLIVE : 10 सितंबर , 2015

भोपाल ।। राजधानी के लाल परेड ग्राउंड पर शुरू हुए तीन दिवसीय विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन का शुभारंभ करने पहुंचे प्रधानमंत्री ने सम्‍मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि, मेरी मातृ भाषा हिंदी नहीं है। मेरी मातृ भाषा गुजराती है। लेकिन मैं कभी सोचता हूं कि अगर मुझे हिंदी नहीं आती तो मेरा ?या हुआ होता। मैं लोगों तक कैसे पहुंचता। मैं लोगों की बात कैसे समझता। मुझे तो व्‍यक्तिगत तौर पर भी भाषा की ताकत क्‍या होती है, इसका भली भांति अंदाजा है। इसलिए मैं कहता हूं जैसे दुनिया में लुप्त होती तमाम चीजों का मूल्य है वैसे भाषा का भी मूल्य है। हर पीढ़ी का दायित्व है भाषा को समृद्धि देना।

उन्‍होंने कहा कि, 'करीब 40 देशों से लोग यहां भाग लेने आए हैं यह एक तरह का महाकुंभ है। उज्‍जैन सिंहस्‍थ से पहले इस महाकुंभ देखने का मौका मिला।'
इस दौरान उन्होंने अपनी अमेरिका, चीन समेत अन्य विदेश यात्राओं का जिक्र करते हुए हिन्‍दी की ताकत, जरूरत और समूचे विश्व में भविष्य की संभावनाओं से अवगत कराया।
पीएम ने सुषमा स्‍वराज का समर्थन करते हुए कहा कि, जब भाषा होती है तो उसकी ताकत का हमें अंदाजा नहीं होता लेकिन जब वो लुप्‍त होती है और सदियों बाद किसी के हाथ आती है तो उसे जानने में लग जाते हैं। आज पत्‍थरों पर कुछ लिखा होता है तो पुरातत्‍व विभाग उसे जानने में लग जाते हैं। भाषा लुप्‍त होने के बाद उसका महत्‍व पता चलता है।'
उन्‍होंने कहा कि, हमारी संस्कृत भाषा में ज्ञान का भंडार भरा हुआ है, लेकिन संस्कृत भाषा के जानकारों की कमी होने के कारण हम उस ज्ञान का लाभ नहीं ले पाए। हमें पता तक नहीं चला कि हम अपनी इस विरासत से धीरे-धीरे कैसे अलग होते गए । हम और चीजों में ऐसे लिप्त होते गए कि अपनी विरासत को संजोकर नहीं रख सके। इसीलिए हर पीढ़ी की दायित्व होता है कि वह अपनी विरासत को संरक्षित करे। आने वाली पीढ़ी के लिए संकलित करे।
हमारा इतिहास वेदों से भरा पड़ा है। उस दौर में वेदपाठी हुआ करते थे। वेदों को स्मृति के माध्यम से संरक्षित किया जाता था। यह परंपरा कई पीढ़ियों तक चली आई और आज यही वजह है कि हमारे वेद सुरक्षित हैं। यह आज की पीढ़ी की जिम्‍मेवारी है कि वो भाषा को सहेजे और उसे आगे की पीढ़ी तक पहुंचाए। मैं गुजरात में पैदा हुआ और अगर मुझे हिन्‍दी नहीं आती तो मेरा क्‍या होता। मैं लोगों तक कैसे पहुंचता या उन्‍हें कैसे समझता। मैं भाषा की ताकत से अच्‍छी तरह अवगत हूं।'
प्रधानमंत्री ने कहा कि हिन्दी के संरक्षण, संवर्द्धन के लिए जिन लोगों ने काम किया उनमें ज्यादातर अहिन्दी भाषी रहे हैं। उन्होंने महात्मा गांधी और कुछ अन्य लोगों के नाम लेते हुए कहा कि आचार्य विनोबा भावे ने भाषा और लिपि-लेखनी की ताकत को पहचाना था और एक रास्ता दिया।
उन्‍होंने कहा कि, भाषा पत्‍थर की तरह जड़ नहीं हो सकती, उसमें भी चेतना है। भाषा मचलता हुआ हवा का झोंका है । जो जहां से गुजरता है वहां से सुगंध लेते हुए चलता है। हमारे लिए उस चेतना की अनुभूति आवश्‍यक है।
मोदी ने आगे कहा कि, भाषा को समृद्ध करने की जरूरत है। हम देश में बोली जाने वाली अन्‍य भाषाओं से नए और ज्‍यादा उपयोग किए जाने वाले शब्‍दों को लेकर हिन्‍दी को समृद्ध करें। भाषा में बड़ी ताकत होती है। यदि आप किसी प्रदेश में जाकर वहां की भाषा में बात करते हैं तो वहां रहने वाले खुश हो जाते हैं।'
उन्‍होंने कहा कि, 'मैं गुजरात से हूं लेकिन लोग आश्‍चर्य करते हैं कि मुझे इतनी अच्‍छी हिन्‍दी कैसे आती है। हम जानते हैं कि हमारे गुजराती लोग हिन्‍दी कैसी बोलते हैं तो वहां लोग मजाक भी उड़ाते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि मुझे चाय बेचते-बेचते हिन्‍दी सीखने का अवसर मिला।'
दुनिया में हिन्‍दी की विश्‍व मे पहचान को लेकर बताया कि, 'पिछले दिनों जब प्रवासी भारतीयों का सम्मेलन हुआ था तो उसमें दुनिया के कई देशों के भारतीय साहित्यकारों और लेखकों की पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया। मैं देखकर हैरान रह गया है कि भारत के छोटे स्वरूप मॉरिशस से 150 लेखकों द्वारा हिंदी पर लिखी गई पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया। इससे पता चलता है कि समूचे विश्व में हिंदी भाषा से लोगों को कितना प्यार है। विदेशों में हमारी बातों को लोग समझ रहे हैं। कई देशों में हिंदी साहित्य केंद्र शुरू किए गए हैं। उज्बेकिस्तान में उज्बेक से हिंदी और हिंदी से उज्बेक में शब्दकोश तैयार किया गया हे। चीन, मंगोलिया और रूस जैसे देशों में हिंदी पर बहुत काम हो रहा है।'
उन्‍होंने भाषा को सहजने को लेकर कहा कि, 'दुनिया में 6 हजार भाषाएं हैं। 21वीं सदी के अंत तक 90 प्रतिशत भाषाएं लुप्‍त होने की आशंका है। अंत में सिर्फ हिन्‍दी, अंग्रेजी और चाइनीज भाषा ही बचेगी। दुनिया हमारी बात मानने को तैयार है कि भाषा नहीं बचेगी तो साहित्‍य कैसे बचेगा। दुनिया भर के देश हिन्‍दी पर काम कर रहे हैं। चीन के लोग हिन्‍दी में बात करते हैं। हमारी फिल्‍मों ने हिन्‍दी को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया। भाषा को बंद दायरे में समेटकर नहीं रखा जा सकता।'
इससे पहले विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज और मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रधानमंत्री का स्‍वागत किया। इसके बाद मुख्‍यमंत्री ने स्‍वागत भाषण दिया। मुख्‍यमंत्री ने कहा कि मैं केवल शब्‍दों नहीं भाव से स्‍वागत करता हूं। मध्‍य प्रदेश कवियों, साहित्‍यकारों की भूमि है। उन्‍होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि हमने उनके नाम पर हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की है जहां विज्ञान और वाणिज्‍य जैसे विषय हिन्‍दी में पढ़ाए जाते हैं।
आने वाले दिनों में डिजिटल वर्ल्ड हम सबके जीवन में बड़ा रोल पैदा करने वाला है। आज टि्वटर पर रोज का खाना तय हो रहा है। सोशल मीडिया पर हर-छोटी बड़ी जानकारी शेयर हो रही है। इसे देखते हुए तकनीकी विशेषज्ञों का भी अब यह मानना है कि बदलती टेक्‍नालॉजी और डिमांड के अनुरूप भारतीय भाषाओं और हिन्‍दी भाषा को तकनीकी रूप से परिवर्तित करना होगा। अब भाषा एक बड़ा बाजार है। इसे भी ध्यान में रखना होगा, ?क्‍योंकि भाषा ही अभिव्‍यक्‍ित का माध्यम है। तकनीक के बढ़ते दखल से चीजों के लुप्त होने का भी खतरा है, इसलिए इसे बचाने के लिए हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार पर भी जोर देना होगा।
इससे पहले सम्मेलन की प्रस्तावना रखते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि पिछले 9 सम्मेलनों की तुलना में इस बार सम्मेलन का स्वरूप साहित्य के बजाए भाषा पर केंद्रित किया गया है। पिछले सम्मेलनों में भाषा के संवर्धन ही नहीं संरक्षण पर भी ध्यान नहीं दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि भाषा अपनी अस्मिता खोती जा रही है। इस बात का ध्यान में रखते हुए हमने इस सम्मेलन में भाषा के विस्तार के साथ विषय भी तय किए हैं, जिन पर विस्तृत चर्चा होगी।
इसी तरह पिछले सम्मेलनों में सिर्फ चर्चा होती थी और रिपोर्ट नहीं आती थी। संबंधित मंत्रियों और उनके विभागों को सालों बाद रिपोर्ट प्राप्त होती थी। इस बार हमने सत्र के समापन के साथ ही रिपोर्ट प्रस्तुत करने और उसका अनुमोदन करने का फैसला लिया है। ताकि समापन के समय अनुशंसाएं तय की जा सकें, संबंधित मंत्रियों को उन्हें सौंपा जा सके और तत्काल ही उनका पालन सुनिश्चित किया जा सके। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि यह सम्मेलन परिणाम मूलक होगा।
सम्‍मेलन का उद्घाटन करने के बाद दोपहर 1 बजे प्रधानमंत्री दिल्‍ली के लिए रवाना हो गए।

 
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