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देश-दुनिया ने निहारा हिंदी के पुरखों का वैभव

MPNEWSLIVE : 11 सितंबर , 2015

भोपाल ।। लाल परेड मैदान गुरुवार से साहित्य और संस्कृति के इंद्रधनुषी रंग से सराबोर हुआ। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की स्मृति को समर्पित पूरे परिसर में हिंदी और भाषा की सुवास है। सफेद दीवारों पर साहित्य के पुरोधाओं के चित्र टंगे हैं तो शब्द कविता और कथन बनकर भीतर का अंधेरा हर रहे हैं। देश-दुनिया से आए 5,440 प्रतिभागी हिंदी के अपने पुरखों को देखकर धन्‍य हो रहे हैं।

कुछ उन्हें जानने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ उन्हें अपने भीतर उतारने की कोशिश में लगे हैं। हिंदी साहित्यकारों की स्मृति में जल रही ज्योति साहित्य के वर्तमान को आलोकित कर रही है। वैसे तो देखने में यहां एक भीड़ दिख रही है और भीड़ की परेशानी भी, लेकिन हर एक भीतर एक जिज्ञासा भी है कि हिंदी के इस महाकुंभ में आखिर अमृत कैसा छलकेगा!
प्रध्ाानमंत्री की उपस्थिति में शुभारंभ सत्र खत्म होने के बाद तीन दिनी विश्व हिंदी सम्मेलन की भीड़ में से चेहरे पहचाने जाने लगे। उत्तर भारत के विभिन्न् राज्यों के अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल आदि राज्यों से आए चेहरे भी अलग-अलग चिन्हित होने लगे। अमेरिका, कनाडा, चीन, चिली, जर्मनी, श्रीलंका, यूके और अफगानिस्तान सहित 39 देशों से आए मेहमानों के चेहरे पर भी हिंदी सम्मेलन की इबारत पढ़ने लायक हो गई। अलग-अलग जगह से आए शोध्ाार्थी अलग-अलग सभागार में सत्रों के लिए चले गए और मीडिया के लोग विदेशी अतिथियों से बाहर बातचीत करते रहे। चाय-पानी और भोजन का सिलसिला भी अपने समय पर।
फिजी के प्रतिनिधि एक ही रंग की पोषाक में
फिजी से आए तकरीबन एक दर्जन प्रतिनिधि एक ही तरह की पोषाक में आयोजन स्थल पर आए थे। नीले रंग पर सफेद सफेद छींटे वाला पोषाक। महिला और पुरुष सभी के कपड़ों का रंग एक जैसा। आते-जाते भी साथ थे। वे भारत आकर खुद को बहुत सौभाग्यशाली मान रहे थे। उनका कहना था, फिजी में हम लोग हिंदी पढ़ते-पढ़ाते हैं, लेकिन यहां इतने सारे लोगों से हिंदी में बात करके अलग मजा आता है।
तपता रहा पांडाल, पसीने में नहाए रहे अतिथि
रामध्ाारी सिंह दिनकर सभाकक्ष के साथ वे सारे सभागृह जिनमें सत्र चल रहे थे, वे वातानुकूलित थे। वहां बैठकर वक्ताओं को सुनना आसान था, लेकिन मुख्य पांडाल जहां प्रदर्शनियां हैं और जहां लोग सभागारों में आते-जाते कुछ देर के लिए ठहरते हैं, पूरी तरह से तप रहा था। लोग हैरान-परेशान पसीने-पसीने होते रहेे। यह परिसर न तो वातानुकूलित है और न ही यहां वेंटिलेशन है।
वक्ता बोल रहे थे, उद्घोषणा जारी थी
राजेन्द्र माथुर सभागृह भी बिना एसी का है। बाकी जगह मीडिया का प्रवेश प्रतिबंध्ाित है, केवल यहीं बैठा जा सकता है। पहले दिन जब यहां 'विज्ञान में हिंदी और 'प्रशासन में हिंदी पर शोध्ापत्र पढ़े जा रहे थे तो वक्ताओं की हालत खराब थी। कुछेक श्रोताओं के समक्ष विद्वान शोध्ा का वाचन कर रहे थे और बाहर से उद्घोषणा के स्वर सुनाई दे रही थी-'चाय खत्म कीजिए और सत्रों में पहंुचिए। ऐसा तीस मिनट तक चलता रहा और वक्ता मुंह बनाते रहे। यहीं बोलते हुए लखनऊ के रमेश त्रिपाठी ने परिसर में लिखी हिंदी की वर्तनी की गलतियों पर चुटकी लेते रहे।
विदेश सचिव की ब्रीफिंग में सवालों का हो-हल्ला
शाम साढ़े चार बजे विदेश सचिव विकास स्वरूप ने प्रेस के लिए ब्रीफिंग शुरू की। दिनभर की गतिविधियां बताने के बाद जब उन्होंने सवाल आमंत्रित किए तो वे उनकी तरफ तीर की तरह गिरे। जवाब सरकारी। हिंदी के साहित्यकारों को क्यों नहीं बुलाया गया, जबकि पिछले 9 सम्मेलनों में बुलाया गया था? जवाब आया कि विदेश मंत्री ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह सम्मेलन अलग हटकर है।
यह साहित्य के लिए नहीं, बल्कि भाषा के लिए है। यह मेरे स्तर का निर्णय नहीं है, बात करेंगे। सवाल पर सवाल चले और हो-हल्ला होने लगा। मीडिया को विभिन्न् सत्रों में क्यों प्रतिबंधित किया गया, जबकि इसके पहले ऐसा नहीं था? फिर वही जवाब, मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसा नहीं चाहता। फिर तो 'आपातकाल है जैसे शब्द गूंजने लगे। कई पत्रकार खड़े हो गए और विरोध शुरू हो गया। हो-हल्ला के बीच ब्रीफिंग खत्म हो गई।

 
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